शिक्षा-व्यवस्था की कमियां तो हम सब देख और समझ पाते हैं, लेकिन यह नहीं सोच पाते कि आखिर इसका उपाय क्या है? क्या वाकई कोई ‘परफेक्ट’ व्यवस्था नहीं हो सकती ताकि सबको समान अवसर भी मिले और किसी के साथ अन्याय भी न हो?

इंसान के अंदर जानने की एक बुनियादी चाहत होती है। आज जिसे हम शिक्षा कहते हैं, वह महज एक व्यवस्थित उपाय है, जानने की अपनी चाहत पूरी करने का और अज्ञानता से निजात पाने का। एक बार कभी कहीं इंसान के मन में यह चेतना उपजी कि अब वह अज्ञानी नहीं रहना चाहता। वह चीजों को जानना और समझना चाहता है। 
आप पाएंगे कि आप जैसी भी पुख्ता व्यवस्था क्यों न बनाएं, बच्चे उसमें सुराख ढूंढ ही लेते हैं। मेरे ख्याल से ऐसे बहुत सारे बच्चे हैं, जो व्यव्स्था में कमियां ढूंढ निकालते हैं इसका मतलब कि वे बच्चे वाकई अच्छे हैं!
हालांकि किसी व्यक्ति की ज्ञान की दिशा कौन-सी होगी, यह व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है, लेकिन मूल रूप से हर व्यक्ति अपने आसपास घिरी अज्ञानता से बाहर निकलना चाहता है। लंबे समय तक मनुष्य की ज्ञान की पाने इस चाहत को एक व्यवस्थित रूप देने की कोशिश चलती रही, इसी कोशिश को ‘शिक्षा’ का नाम दिया गया।
शिक्षा की मूल प्रकृति है ‘जानना’।

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